पीर पालित प्रीत मेरी
बंसीवट की छाँव में
निज सांवरे की बाट तकती
राधिका बन रह गयी है , पीर पालित प्रीत मेरी !
स्वाति की ही बूँद से
तृप्ति करे जो प्यास की
ताकती आकाश को है ,
चातकी विश्वास की
जो रहे मर्यादा में, वह
साधिका बन रह गयी है , पीर पालित प्रीत मेरी !
विरह की ही देन है
रस रंग भी संगीत भी
विरह से उपजें हैं ये ,
सब भाव शब्द गीत भी
टूटी मन-वीणा की देखो
वादिका बन रह गयी है , पीर पालित प्रीत मेरी !
याचना लेकर नयन में
होठों पे मनुहार लेकर
पथ प्रिय का देखती जो
फीका सा श्रृंगार लेकर
एक ठुकराई हुई सी ,
याचिका बन रह गयी है , पीर पालित प्रीत मेरी !