Wednesday, November 9, 2011

  पीर पालित प्रीत मेरी 


बंसीवट की छाँव में
निज सांवरे की बाट तकती
राधिका बन रह गयी है , पीर पालित प्रीत मेरी !
स्वाति की ही बूँद से
तृप्ति करे जो प्यास की
ताकती आकाश को है ,
चातकी  विश्वास  की
जो रहे मर्यादा में, वह
साधिका बन रह गयी है , पीर पालित प्रीत मेरी !
विरह की ही देन है 
रस रंग भी संगीत भी 
विरह से उपजें हैं ये ,
सब भाव शब्द गीत भी
टूटी मन-वीणा की देखो 
वादिका बन रह गयी है , पीर पालित प्रीत मेरी !
याचना लेकर नयन में 
होठों पे मनुहार लेकर 
पथ प्रिय  का देखती जो 
फीका सा श्रृंगार लेकर 
एक ठुकराई हुई सी ,
याचिका बन रह गयी है , पीर पालित प्रीत मेरी !     

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