कविता कलश
Sunday, May 19, 2013
Saturday, September 29, 2012
अस्तित्व
उलझा हुआ , टूटा हुआ ,
फूटा हुआ , बिखरा हुआ ,
यूँ तो मेरा व्यक्तित्व है ,
पर यही क्या कम है कि ,
कुछ तो मेरा अस्तित्व है !
साधना खंडित हुई ,
गंतव्य का भूला पता !
कंटकित हो रह गई ,
कमनीय जीवन की लता !
किन्तु क्या कुंठित हूँ मैं ,
निर्दय समय यह तो बता !
क्या कहीं अवसाद की
छाया दिखाई दी कहीं ,
उत्साह में डूबा हुआ ,
सारा मेरा कृतित्व है !
आज तक भी है सुवासित
मन का मुरझाया कमल !
हर नयन का नीर लगता
है, मुझे गंगा का जल !
बाँट पाऊं दुःख किसी का
तो लगे जीवन सफल !
अब पराये-अपने का ,
भ्रमजाल मन से हट गया ,
वातावरण में हर तरफ ,
दिखने लगा अपनत्व है !
उलझा हुआ ,टूटा हुआ
फूटा हुआ , बिखरा हुआ ,
यूँ तो मेरा व्यक्तित्व है !
पर यही क्या कम है कि ,
कुछ तो मेरा अस्तित्व है !!
विष-पान
सुन मानव ,
शिव बन कर तुझ को ,
ये विष खुद ही पीना होगा !
जैसा भी हो तेरा जीवन ,
तुझ को हँस कर जीना होगा !
ये सच है की तूने अपना ,
मनचाहा वरदान न पाया !
अधिकारी था जिसका , तूने
अब तक वह सम्मान न पाया !
पर ना हिम्मत हार मिलेगा ,
अब तक जो स्थान ना पाया !
चमकेगा नक्षत्र की भांति ,
तू भी एक नगीना होगा !
जैसा भी हो तेरा जीवन ,
तुझ को हँस कर जीना होगा !!
ये बाधायें , ये सारे दुख ,
जीवन के शिक्षक होते हैं !
रोते हैं जो विपदाओं में ,
कर्महीन , कायर होते हैं !
वीर नहीं विपरीत समय में ,
निज मन का साहस खोते हैं !
तार-तार होगा जब दामन ,
तुझ को खुद ही सीना होगा !
जैसा भी हो तेरा जीवन ,
तुझ को हँस कर जीना होगा !!
विवश
सूरज की पहली किरण जैसा
तुम्हारा स्वर्णिम रूप ,
विवश कर देता है मुझे ,
व्यस्तता की नींद से जागने के लिए !
समय के तेज़ घूमते पहियों के साथ
दौड़ लगाता हुआ मैं ,
विवश हो जाता हूँ ,
तुम्हारे पास कुछ पल ठहरने के लिए !
चंद्रमा की तरह शीतल ,
तुम्हारी सहज स्नेह भरी दृष्टि
जब मुझ पर पड़ती है ,
तब भावनाओं के समुद्र में,
ज्वार सा आ जाता है ,
सृजन की प्रेरणा बन कर तुम ,
विवश कर देती हो नया कुछ रचने के लिए !
कडवे विषैले शब्दों के जंगल में
तुम्हारी मीठी बातें ,
निर्भयता का वरदान देती प्रतीत होती हैं ,
तभी तो मेरा मन ,
फुदकने लगता है खरगोश की तरह,
तुम्हारे शब्दों की मुलायम घास पर !
मोहिनी आस
रह जाते हैं स्वप्न अधूरे ,
सब को सब कुछ कब मिलता है !
जीवन के तालाब में देखो ,
यूँ तो कीचड़ भरी पड़ी है !
पर जो है उस पार किनारा ,
वहाँ मोहिनी आस खड़ी है !
जो कहती है क्षुद्र पराजय
से, मन की हर विजय बड़ी है !
यही देखना है अब केवल
कमल हृदय का कब खिलता है !
रह जाते हैं स्वप्न अधूरे ,
सब को सब कुछ कब मिलता है !!
जब-जब मन कमज़ोर हुआ है
और आस्था घबराई है !
ना जाने तब किस बिंदु से ,
ये आवाज़ सदा आई है !
चलता रह चलने वाले ने ,
मंजिल निश्चित ही पाई है !
दोहरा लेता हूँ ,जब मन का
दृढ़ विश्वास कभी हिलता है !
रह जाते हैं स्वप्न अधूरे ,
सब को सब कुछ कब मिलता है !!
Saturday, September 15, 2012
Wednesday, November 9, 2011
पीर पालित प्रीत मेरी
बंसीवट की छाँव में
निज सांवरे की बाट तकती
राधिका बन रह गयी है , पीर पालित प्रीत मेरी !
स्वाति की ही बूँद से
तृप्ति करे जो प्यास की
ताकती आकाश को है ,
चातकी विश्वास की
जो रहे मर्यादा में, वह
साधिका बन रह गयी है , पीर पालित प्रीत मेरी !
विरह की ही देन है
रस रंग भी संगीत भी
विरह से उपजें हैं ये ,
सब भाव शब्द गीत भी
टूटी मन-वीणा की देखो
वादिका बन रह गयी है , पीर पालित प्रीत मेरी !
याचना लेकर नयन में
होठों पे मनुहार लेकर
पथ प्रिय का देखती जो
फीका सा श्रृंगार लेकर
एक ठुकराई हुई सी ,
याचिका बन रह गयी है , पीर पालित प्रीत मेरी !
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