Saturday, September 29, 2012

विवश 

 सूरज की पहली किरण जैसा 
तुम्हारा स्वर्णिम रूप ,
विवश कर देता है मुझे ,

व्यस्तता की नींद से जागने के लिए !
समय के तेज़ घूमते पहियों के साथ
दौड़ लगाता हुआ मैं ,
विवश हो जाता हूँ ,
तुम्हारे पास कुछ पल ठहरने के लिए !
चंद्रमा की तरह शीतल ,
तुम्हारी सहज स्नेह भरी दृष्टि 
जब मुझ पर पड़ती है ,
तब भावनाओं के समुद्र में,
ज्वार सा आ जाता है ,
सृजन की प्रेरणा बन कर तुम ,
विवश कर देती हो नया कुछ रचने के लिए !
कडवे विषैले शब्दों के जंगल में 
तुम्हारी मीठी बातें ,
निर्भयता का वरदान देती प्रतीत होती हैं ,
तभी तो मेरा मन ,
फुदकने लगता है खरगोश की तरह,
तुम्हारे शब्दों की मुलायम घास पर !

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