अस्तित्व
उलझा हुआ , टूटा हुआ ,
फूटा हुआ , बिखरा हुआ ,
यूँ तो मेरा व्यक्तित्व है ,
पर यही क्या कम है कि ,
कुछ तो मेरा अस्तित्व है !
साधना खंडित हुई ,
गंतव्य का भूला पता !
कंटकित हो रह गई ,
कमनीय जीवन की लता !
किन्तु क्या कुंठित हूँ मैं ,
निर्दय समय यह तो बता !
क्या कहीं अवसाद की
छाया दिखाई दी कहीं ,
उत्साह में डूबा हुआ ,
सारा मेरा कृतित्व है !
आज तक भी है सुवासित
मन का मुरझाया कमल !
हर नयन का नीर लगता
है, मुझे गंगा का जल !
बाँट पाऊं दुःख किसी का
तो लगे जीवन सफल !
अब पराये-अपने का ,
भ्रमजाल मन से हट गया ,
वातावरण में हर तरफ ,
दिखने लगा अपनत्व है !
उलझा हुआ ,टूटा हुआ
फूटा हुआ , बिखरा हुआ ,
यूँ तो मेरा व्यक्तित्व है !
पर यही क्या कम है कि ,
कुछ तो मेरा अस्तित्व है !!
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