मोहिनी आस
रह जाते हैं स्वप्न अधूरे ,
सब को सब कुछ कब मिलता है !
जीवन के तालाब में देखो ,
यूँ तो कीचड़ भरी पड़ी है !
पर जो है उस पार किनारा ,
वहाँ मोहिनी आस खड़ी है !
जो कहती है क्षुद्र पराजय
से, मन की हर विजय बड़ी है !
यही देखना है अब केवल
कमल हृदय का कब खिलता है !
रह जाते हैं स्वप्न अधूरे ,
सब को सब कुछ कब मिलता है !!
जब-जब मन कमज़ोर हुआ है
और आस्था घबराई है !
ना जाने तब किस बिंदु से ,
ये आवाज़ सदा आई है !
चलता रह चलने वाले ने ,
मंजिल निश्चित ही पाई है !
दोहरा लेता हूँ ,जब मन का
दृढ़ विश्वास कभी हिलता है !
रह जाते हैं स्वप्न अधूरे ,
सब को सब कुछ कब मिलता है !!
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