Wednesday, January 27, 2010
मानस का महाभारत
अभावों की पांचाली का चीरहरण !
भूख का भीष्म पितामह ,
देखता रहता है करुणा से !
भाग्य, अँधा धृतराष्ट्र बनकर,
ताकता है शून्य में !
आत्म गौरव की गांधारी ,
बाँध लेती है आँखों पर ,
निर्लज्जता की पट्टी !
विवशता का युधिष्ठर ,
बैठा रहता है सर झुकाए !
असफल महत्वाकांक्षा का भीम ,
दांत पीसता हुआ ,
मलता है हाथों को !
कर्म ,अर्जुन की तरह साधता है निशाना ,
पुरुषार्थ के धनुष -बाण से ,
किन्तु मछली की आँख सा सूक्ष्म लक्ष्य ,
बच जाता है ,बिंध नहीं पाता !
साधनों के श्रीकृष्ण ,
कदाचित सो गए हैं ,
तभी तो नहीं सुनते ,
अभावों की पांचाली की
कर्ण-भेदी पुकार !!
सर्वोत्तम अवसर कविता है
मनोभावों की अभिव्यक्ति का ,
सर्वोत्तम अवसर कविता है !
व्याख्या छोटी सी होती है ,
प्रसंग अधिक खिंच जाता है !
व्याख्या-प्रसंग के पाटों में ,
मंतव्य सहज भींच जाता है !
वाणी सरिता बन सकती है
यदि मन के भीतर कविता है !!
मनोभावों की अभिव्यक्ति का ,
सर्वोत्तम अवसर कविता है !!
सौ पृष्ठों की पुस्तक पढ़कर ,
जो बात सामने आती है !
उस सार को ही कविता -कोकिल ,
कुछ शब्दों में कह जाती है !
छोटी बातों के अर्थ बड़े
गागर में सागर कविता है !
मिलती है गहन चिंतन से जो ,
कविता वह सरल विभूति है !
हर भावुक के मन को छूती ,
निर्मलतम यह अनुभूति है !
सब व्यथितों का जिसमे हो वरन
वह एक सवय्म्वर कविता है !
मनोभावों की अभिव्यक्ति का ,
सर्वोत्तम अवसर कविता है !!
एहसास की खुशबु
महसूस कर के देखिये एहसास की खुशबु !
सांसों के आस -पास किसी खास की खुशबु !!
लगती है पपीहे की चहकती पुकार सी ,
बजती है धडकनों में सुरीले सितार सी ,
लगती है लड़कपन के लरजते निखार सी ,
दिलकश है बड़ी आस की विश्वास की खुशबु !
महसूस कर के देखिये एहसास की खुशबु !!
जिसकी सुहानी थाप है कोमल मृदंग सी ,
तरुनाई की बैलोस इक अल्हड उमंग सी ,
जीवन की तलैया में मचलती तरंग सी ,
मोहन 'औ' राधिका के महारास की खुशबु !
महसूस कर के देखिये एहसास की खुशबु !!
Monday, January 25, 2010
कहे मन की लगन
कहे मन की लगन मैं तो ये चाहूँ री !
'पी' के होठों से लग कर बनूँ बांसुरी !!
गीत कितने ही मुझको सुनाता रहा !
वो तो हर रंग में मन लुभाता रहा !
मैंने परखा उसे ले परीक्षा कई ,
हर परीक्षा में वो मुस्कुराता रहा !
मैंने निर्णय लिया दूँ पुरस्कार में ,
उसको इस अपने सौंदर्य की माधुरी !
'पी' के होठों से लग कर बनूँ बांसुरी !!
धीर है वीर है कितना गंभीर है !
लक्ष्य से जो न चुके वो वह तीर है !
उसका मन कुछ व्यथित कल था मेरे लिए ,
मेरे मन में अब उसके लिए पीर है !
सोचती मैं रहूँ बस यही हर घडी
मेरे मन पे वो क्या कर गया जादू री !
'पी' के होठों से लग कर बनूँ बांसुरी !!
तुम्हें गीत अपने सुनाता रहूँगा
मैं गाता रहा हूँ मैं गाता रहूँगा !
तुम्हे गीत अपने सुनाता रहूँगा !!
मेरे गीत में पीर उनकी छुपी है, जो दुनिया में खुलकर कभी रो ना पाए ,
रातें जिन्होंने हैं आँखों में काटी, किए रतजगे नींद भर सो ना पाए ,
रूठी हुई सी है जिनसे ये दुनिया
मैं कर मान उनको मनाता रहूँगा !
तुम्हे गीत अपने सुनाता रहूँगा !!
कहता हूँ मैं बात उनके दिलों की, जो सहते रहे हैं तिरस्कार अपना ,
हर पग पे लगती रही जिनको ठोकर, पा न सके जो कभी प्यार अपना ,
मैं मेल ऐसे ही बिछड़े दिलों का
कोई जतन कर कराता रहूँगा !
तुम्हे गीत अपने सुनाता रहूँगा !!
युगों से प्रणय पीर सहता रहा है, सदा शूल जग ने हैं पथ में बिछाए ,
अस्तित्व अनगिन यहाँ प्रेमियों के ,निष्ठुर जगत ने स्वयं ही मिटाए ,
श्रद्धा-सुमन मैं तो उन प्रेमियों के
स्मारक पे जाकर चढ़ाता रहूँगा !
तुम्हें गीत अपने सुनाता रहूँगा !!
तुम भी सुनो तुम मेरी प्रेमिका हो, ह्रदय से प्रणय मैंने तुमसे किया है ,
तुम्हारी घृणा का हलाहल भी मैंने, सुधा-सम समझ प्रेम से ही पिया है ,
मुझे देखकर द्वार मत बंद करना
तुम्हारी गली में मैं आता रहूँगा !
तुम्हे गीत अपने सुनाता रहूँगा !!
बैठना लिखने तभी
फूटने को मन का जब ज्वालामुखी तैयार हो !
बैठना लिखने तभी जब लेखनी में धार हो !!
अर्थ के नंगे बदन पर शब्द के जो वस्त्र हैं,
ये न हों तो अर्थ सारे पूर्णत: निर्वस्त्र हैं ,
वाणी हो उन्मुक्त, मर्यादा का पर संचार हो !
बैठना लिखने तभी जब लेखनी में धार हो !!
है सभी का हित निहित सच्चे सरस साहित्य में ,
इतना बल रखना हमेशा अपने हर कृतित्व में ,
हर बुराई पर तुम्हारे वार से प्रहार हो !
बैठना लिखने तभी जब लेखनी में धार हो !!
लक्ष्य जो न बेध पाओ तो धनुर्धर तुम नहीं ,
काव्य में न रस भरा तो रस के सागर तुम नहीं ,
शब्द को तब तीर कहना जब ह्रदय के पार हो !
बैठना लिखने तभी जब लेखनी में धार हो !!
Tuesday, January 19, 2010
सोने के हिरन सी वो
सोने के हिरन सी वो चन्द्र की किरण सी वो ,
मोहक मिलन सी वो मूर्ति है मन में !
उसके सिवा तो कुछ सूझता नहीं है अब ,
नाम उसका है मेरी हर धड़कन में !
अक्स आइने में मेरा आए ना नज़र मुझे ,
छवि उसकी ही दिखती है दर्पण में !
उस से मिला तो मेरा मन ऐसे झूम उठा ,
राधा को मिलें हों श्याम जैसे मधुबन में !
कवि की प्रार्थना
ये गीत कभी न अतीत बनें,
सदा इनमे सनातन तत्व रहे
हे शारदे माँ यह वर दे दो ,
मेरी वाणी में अमरत्व रहे