Wednesday, January 27, 2010

मानस का महाभारत

नित्य दुखों का दुर्योधन करता है
अभावों की पांचाली का चीरहरण !
भूख का भीष्म पितामह ,
देखता रहता है करुणा से !
भाग्य, अँधा धृतराष्ट्र बनकर,
ताकता है शून्य में !
आत्म गौरव की गांधारी ,
बाँध लेती है आँखों पर ,
निर्लज्जता की पट्टी !
विवशता का युधिष्ठर ,
बैठा रहता है सर झुकाए !
असफल महत्वाकांक्षा का भीम ,
दांत पीसता हुआ ,
मलता है हाथों को !
कर्म ,अर्जुन की तरह साधता है निशाना ,
पुरुषार्थ के धनुष -बाण से ,
किन्तु मछली की आँख सा सूक्ष्म लक्ष्य ,
बच जाता है ,बिंध नहीं पाता !
साधनों के श्रीकृष्ण ,
कदाचित सो गए हैं ,
तभी तो नहीं सुनते ,
अभावों की पांचाली की
कर्ण-भेदी पुकार !!

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