कहे मन की लगन मैं तो ये चाहूँ री !
'पी' के होठों से लग कर बनूँ बांसुरी !!
गीत कितने ही मुझको सुनाता रहा !
वो तो हर रंग में मन लुभाता रहा !
मैंने परखा उसे ले परीक्षा कई ,
हर परीक्षा में वो मुस्कुराता रहा !
मैंने निर्णय लिया दूँ पुरस्कार में ,
उसको इस अपने सौंदर्य की माधुरी !
'पी' के होठों से लग कर बनूँ बांसुरी !!
धीर है वीर है कितना गंभीर है !
लक्ष्य से जो न चुके वो वह तीर है !
उसका मन कुछ व्यथित कल था मेरे लिए ,
मेरे मन में अब उसके लिए पीर है !
सोचती मैं रहूँ बस यही हर घडी
मेरे मन पे वो क्या कर गया जादू री !
'पी' के होठों से लग कर बनूँ बांसुरी !!
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