Monday, January 25, 2010

कहे मन की लगन

कहे मन की लगन मैं तो ये चाहूँ री !

'पी' के होठों से लग कर बनूँ बांसुरी !!

गीत कितने ही मुझको सुनाता रहा !

वो तो हर रंग में मन लुभाता रहा !

मैंने परखा उसे ले परीक्षा कई ,

हर परीक्षा में वो मुस्कुराता रहा !

मैंने निर्णय लिया दूँ पुरस्कार में ,

उसको इस अपने सौंदर्य की माधुरी !

'पी' के होठों से लग कर बनूँ बांसुरी !!

धीर है वीर है कितना गंभीर है !

लक्ष्य से जो न चुके वो वह तीर है !

उसका मन कुछ व्यथित कल था मेरे लिए ,

मेरे मन में अब उसके लिए पीर है !

सोचती मैं रहूँ बस यही हर घडी

मेरे मन पे वो क्या कर गया जादू री !

'पी' के होठों से लग कर बनूँ बांसुरी !!

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