तुम्हे देखकर जी करता है
कवि बनूँ लिख डालूँ कविता
खंजन से भी सुन्दर लोचन
पंखुड़ियों से अधर सलोने
चाल देखकर लगता है यूँ
विचर रहें हों ज्यों मृग-छौने
अमरबेल सी लहराती हो
चुपके-चुपके कुछ गाती हो
अल्हड़पन में धूम मचाती
घूमे है ज्यों कोई वनिता
तुम्हे देखकर जी करता है
कवि बनूँ लिख डालूँ कविता !!
सूरज की किरणों से कुंतल
चन्द्र की भांति निखरा आनन्
चहुन्दिशी फैला आभामंडल
वाणी भी कितनी मनभावन
देवतुल्य है छवि तुम्हारी
शत-शत जाऊं मैं बलिहारी
लगता है ईश्वर ने तुमको
दे दी अपनी सारी शुचिता
तुम्हे देखकर जी करता है
कवि बनूँ लिख डालूँ कविता !!
मूर्तिमान हो रूप स्वयं ज्यों
आया हो मेरे आँगन में
ज्यों मनमोहन नटवर नागर
रास रचाएं वृन्दावन में
जैसे कोई प्रेम का निर्झर
बरस रहा हो मेरे मन पर
भिगो रही हो तन को जैसे
प्रथम प्रेम की पावन सरिता
तुम्हे देखकर जी करता है
कवि बनूँ लिख डालूँ कविता !!
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